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24 September, 2014

जिंदगी --


जिंदगी
झूठे सपने की तलाश नहीं
पंखे से लटकती हुई लाश नहीं
अनकही अनसुनी दिल की आवाज नहीं
अंतहीन भयावह भुतही रात नहीं

जिंदगी
स्वर्ग और नरक के बीच का गीत नहीं
जन्म और मरण के मध्य का संगीत नहीं
प्रज्ञा और प्रमाद के बीच का द्वन्द नहीं
देव और दानव के खेल का अंत नहीं

जिंदगी
सुनहरी साड़ी में लिपटी हुई प्यारी सी सुबह नहीं
दिन ढल जाने का मातम मनाता श्यामला शाम नहीं
अपने आपको हर क्षण खो देने का भय नहीं
सृष्टि और श्रेष्ठि के अस्तित्व को मानने का संशय नहीं

जिंदगी
सतत सोचते रहने वाला भारी भरकम सवाल नहीं
मज़े और मौज से भरा बस ख्याल नहीं
जीने का सही नाम जिंदगी है
सही राग ना मिले तो बेसुरा राग ही सही .

~~~ रामानुज दुबे

Orkut & Publicity of plays




Orkut account will not be available after 30th September 2014.  I have two orkut accounts and these days I am visiting these accounts regularly. Taking out all old photos and other stuffs. After downloading the photos, I am deleting the album. It gives a very melancholy feeling. How enthusiastically once I used to upload photo there!


Today I downloaded some posters, brochure and paper clippings of Plays directed by me.  I never cared to collect paper reviews or posters. Most of the time I worked in small & interior places where media reach was almost negligible. If any reports were published, I would collect it but never gave much importance. Always believed working silently & effectively but orkut changed my that perception. After opening up the account on orkut, very fondly I used to share publicity material of the plays. I was laggard in opening the orkut account .It was around 2007 when I had opened the orkut account. That time I was associated with a theatre group  Aalay- Bhagalpur, that theatre group was at that time in formation stage. We had done many experiments on various levels in our plays – be it stage or street. At present Aalay has emerged as a mature group and this group has some trained actors from reputed institutions of our country. Some actors graduated to directors. My heartiest/ best wishes to the group. 

After downloading the posters, brochure and paper clippings of Plays from orkut, I thought to put these things on my blog. Then I thought what the use of sharing it there then I feel what these clippings will do in my document folder. Let it be on the blog for the sake of orkut- my first moorings with social media.  Sharing it below -















~~~ Ramanuj Dubey


04 August, 2014

नंगे लोग -



मैं हर रोज नंगे लोगों को देखता हूँ .

रस्ते के किनारे  पड़ा
हर शाम
देशी पिए
नंगा मजदूर

फटी चड्डी में
इधर उधर भटकता
भूखा भिखारी

सड़को गलियों में
हरदम दौड़ता
गरीबों के बच्चे
जिन्हें कपडे तब तक नहीं मिलते
जब तक जवानी
शरीर में दस्तक ना दे दे .

ये हसते नंगे लोग
नंगे होकर भी
नंगे नहीं लगते .

कपडे पहने नंगे लोग
परिचय पत्र बिना भी
पहचान में आ जाते हैं

कुछ लोगों की नग्ण्ता
अति संक्रामक होती है
बाजार से शुरू होती नंगई
समां जाती है
समाज तक
क्षण भर में .

फिर बिकता है
नंगापन
फटाफट
सोने के भाव .

कपडे यहाँ कोई नहीं पूछता
जो खरीद सकते है
वो कपडा नहीं
नंगापन खरीदते  है

डरता हूँ
कहीं नंगापन ही
ना बन जाए हम सबकी पहचान

~~~ रामानुज दुबे





29 June, 2014

चर्चा अंगिका और इस भाषा के पहले फिल्म की ---





अंगिका हिंदी की सिस्टर लैंग्वेज है . मेरी  मातृभाषा . ऐसे अंगिका - बंगाली , मैथिलि , ओड़िया और असमिया की भी सिस्टर लैंग्वेज है . मातृभाषा होने के बावजूद भी इस भाषा का काफी कम प्रयोग कर पाता हूँ . माँ , भैया , भाभी और दीदी - कुल जोड़कर चार लोग हैं जिनसे मेरी अंगिका में बात होती है . कभी कभार किसी  पुराने  मित्र या रिश्तेदार का फ़ोन आ जाता है तो अंगिका में बात होती है . इसके अलावा बिहार -झारखण्ड से जितने भी लोगों से बात होती है , उनसे हिंदी में ही बात होती है . यहाँ तक की घर के बच्चे भी (भतीजा , भतीजी , भांजा , भांजी ) हिंदी में ही बात करने में सहज महसूस करते हैं . मेरे एक मित्र के अनुसार नई पीढ़ी के बच्चे अंगिका में न के बराबर बात करते है . कारण - जो कान्वेंट में पढ़ते हैं उन्हें अंग्रेजी तंदुरुस्त करने के लिए शिक्षक स्कूल में लगभग अंग्रेजी में ही बात करने को प्रोत्साहित  करते है और जो बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते है वो हिंदी दुरुस्त करने के लिए आपस में हिंदी में बात करते है . बेचारी अंगिका सरकारी - कान्वेंट हर जगह बेगानी है .

मेरा एक मित्र है - हिमाचल से . उसे डोगरी भाषा  से बहुत प्यार है . काफी मीठी आवाज है उसकी . हमें डोगरी में काफी लोकगीत सुनाता था .एक बार उसके साथ 'डोगरी ' और 'अंगिका ' की स्थिति को लेकर बहस छिड़ी तो उसने  'डोगरी ' को लेकर अपना एक बड़ा मजेदार अनुभव सुनाया . बताया - हिमाचल की लड़कियाँ घर में तो 'डोगरी ' बोल भी लेती है पर कॉलेज में , रेस्टोरेंट में , पब्लिक प्लेस में या हिमाचल से बाहर डोगरी बोलने में शर्म महसूस करती है . आप उनसे डोगरी में बात करते रहो लेकिन वो जवाब देंगी हिंदी में ही . लड़कों के साथ ऐसा नहीं है . सौ में से नब्बे फीसदी लड़के डोगरी में बात करने पर डोगरी में ही जवाब देते हैं . उसका 'जेंडर आधारित अवलोकन ' कितना सही है या गलत भगवान जाने - पर है मजेदार . मेरा भी एक मजेदार अनुभव 'अंगिका ' को लेकर है . २००९- २०१० की बात है . मैं हैदराबाद एयरपोर्ट पर पुणे जाने वाली फ्लाइट का इंतजार कर रहा था .सामने बैठे सहयात्री से बात करने पर पाता चला की वो भागलपुर से है . मैं अंग्रेजी से अंगिका पर आ गया . पर भाई साहब अंगिका इतने आर्टिफिसिली सोफिस्टिकेशन ' के साथ बोल रहे थे , ऐसा लग रहा था या तो वो अपने लेवल से उतरकर अंगिका में बात कर रहे हों या फिर अंगिका में बोलकर इस भाषा पर उपकार कर रहे हों . मुझे लगा इस भाई साहब से अंग्रेजी में ही बात करना सही है . मैं फिर अंग्रेजी में ही बातचीत जारी रखा . आप अपने क्षेत्र के लोगो से अपनी मातृभाषा में इसलिए बात करते हो कि वार्तालाप सहज हो , आत्मीयता बढे . अगर मातृभाषा यह काम करने में असफल रहती है तो दुःख होता है , चोट पहुँचती है .

अंगिका मूलतः बोलचाल की भाषा है . एक बड़ी संख्या में लोग इस भाषा को बोलते है .अंगिका लोकगीत पूरे हिंदी पट्टी में लोकप्रिय है . कुछ साल पहले भागलपुर के लोकल अख़बार में 'अंगिका ' में कॉलम भी छपना शुरू हुआ था (पता नहीं अभी भी छप रहा है या नहीं ) और कुछ साहित्यकारों के अंगिका में कहानियाँ और उपन्यास भी लिखा है ( दुःख की बात है अभीतक अंगिका का  एक भी कहानी या उपन्यास नहीं पढ़ पाया हूँ ). मेरे एक पत्रकार मित्र का मानना है - प्रतिभाशाली साहित्यकार अंगिका में कहानी या उपन्यास लिखने से बचते है - कारण यहाँ तो ना ही  पहचान  हैं , ना  ही पैसा . हिंदी में लिखेंगे तो ख्याति भी मिलेगी और बडा पाठक वर्ग भी .

अंगिका में एक दो फिल्में भी बनी हैं . कुछ खास नहीं .  औसत से भी नीचे . बेकार . कुछ महीने तक मेरी धारणा थी कि अंगिका में अच्छी फिल्म नहीं बन सकती . लेकिन मैं गलत था . कुछ महीने पहले टी. वी. पर चैनल बदल रहा था तो ' डी डी  भारती ' पर अंगिका में प्रोग्राम आते देखकर रुक गया . सोचा कोई डाक्यूमेंट्री फिल्म होगी . यदा कदा डाक्यूमेंट्री फिल्म में ही अंगिका को सुन पाता हूँ . लेकिन प्रोग्राम डॉक्यूमेंट्री नहीं था - फिल्म थी - टेली फिल्म . कुछ देर बाद फिल्म में अमोल पालेकर को देखा . अमोल पालेकर को अंगिका में बोलते देखकर मन गदगद हो गया .  आपका एक पसंदीदा कलाकार  जिसकी मातृभाषा मराठी हो वो हिंदी में नहीं अंगिका में बोल रहा हो वो भी डब नहीं अपनी आवाज में , ख़ुशी मिलेगी ही . फिल्म अच्छी थी . इस फिल्म में अमोल पालेकर एक आवारा मजदूर की भूमिका निभाई है जो औरतबाज है . मजदूरी के लिए जाते समय उसकी मुलाकात एक औरत से हो जाती है जो गर्भवती है , और गर्भ का पूरा समय हो गया है और रस्ते पर पड़ी  प्रसव पीड़ा में है .  बारिश हो रही है . अस्पताल जाने वाले रस्ते में नदी भी है .कहानी उस मजदूर द्वारा उस महिला को सुरक्षित अस्पताल पहुंचा , डॉक्टर से विनती कर अस्पताल में दाखिला दिला सुरक्षित प्रसव करवाने तक ही है . तमाम अवगुणों के बावजूद वह मजदूर उस महिला की सहायता निःस्वार्थ भाव से  करता है . वह मजदूर उस महिला का ना प्रेमी है , ना पति , ना सगा, ना संबंधी, ना ग्रामीण , ना जान पहचान वाला - बस मानवता के नाते वह महिला की मदद करता है . फिल्म को बीच से देखा था तो फिल्म के नाम का पता  नहीं चल पाया . विकिपीडिया पर सर्च किया तो पता चला उस टेली फिल्म का नाम था " आदमी और औरत " और उसके निर्देशक थे - तपन सिन्हा  जो  भारत के जाने माने फिल्म निर्देशक रहे हैं . छप्पन मिनट की ये फिल्म सन १९८४ में बनी थी जिसे प्रोडूस दूरदर्शन ने किया था और पहली बार दूरदर्शन पर दिखाया गया था . इस फिल्म को  भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव २००७ में भी दिखाया गया था . हालाँकि  विकिपीडिया पर इस फिल्म की भाषा  हिंदी बताई गयी है लेकिन पूरी  फिल्म अंगिका में है . मेरे ख्याल से " आदमी और औरत " अंगिका की पहली (टेली ) फिल्म है . कितनी सुखद बात है की अंगिका की पहली फिल्म के निर्देशक तपन सिन्हा और  लेखक प्रफुल्ला रॉय  बंगाली और मुख्य कलाकार अमोल पालेकर मराठी और महुआ रॉय चौधरी बंगाली है .


~~~ रामानुज दुबे

24 May, 2014

प्रगतिशील

पहले ने कहा
मैं प्रगतिशील हूँ
क्योंकि मैं चिकेन खाता हूँ

दूसरे ने कहा

मैं प्रगतिशील हूँ
क्योंकि मैं गाय खाता हूँ

तीसरे ने कहा

मैं प्रगतिशील हूँ
क्योंकि मैं सुअर खाता हूँ

चौथे ने कहा

मैं  भी प्रगतिशील हूँ
क्योंकि मैं कबूतर खाता हूँ

पांचवें ने कहा

मैं सबसे बड़ा प्रगतिशील हूँ
क्योंकि मैं आदमी खाता हूँ
चबाता हूँ
डकार मार पचा जाता हूँ
आदमी के खून पी
पला बढ़ा मैं
आदमी को
 आदमी के हित की बात बताता हूँ

उस पांचवें सत्तासीन को देख

चारों ने शर हिला डुला कर
एक सुर मैं कहा
हाँ - हाँ -
तुम सबसे बड़े प्रगतिशील हो .

~~~ रामानुज दुबे 

27 April, 2014

हजार हजार के पांच नोट और पॉकेटमार -


कल रात आठ बजे जब कमरे पर पहुंचा तो पाया जींस की जेब में पर्स नहीं है . पर्स में दस रूपये के दो नोट और एक हजार वाले पांच नोट थे . हजार रूपये वाले नोट असली नहीं थे , नकली थे . दस रूपये में पांच नोट लिया था हजार रूपये वाला, एक दुकान से  .नाटक के एक दृश्य  में जरुरत थी . पर्स के खोने का गम नहीं था लेकिन पॉकेटमारी हो जाये तो खीज तो होती ही है , इतना लापरवाह कैसे हो गया ही कोई मेरा पर्स टपका दे .

रातभर नींद नहीं आई . सोचता रहा - कब पर्स उड़ाया होगा मेरे पॉकेट से . राजेंद्रनगर से जब चला था तो पर्स पॉकेट में था , रास्ते में बस कंडक्टर को बस पास दिखाने के लिए पर्स से पास निकालकर कमीज वाले पॉकेट में रखा था . साथ ही पांच सौ का एक नोट भी कमीज वाले पॉकेट में था . जींस को नाटक वाले दिन पहना था तो पर्स जींस की जेब में था और पर्स में रह गया था नकली नोट . मेहदीपट्नम में उतरने के बाद पॉकेट में आदतन हाथ डाला था , उस समय पर्स पॉकेट में ही था . तो पॉकेटमारी मेहदीपट्नम  से राजेंद्रनगर लौटते समय  हुआ है .

जब इण्टर में था तो मेरा एक सहपाठी था , जिससे मेरी गहरी छनती थी , पॉकेटमार था . उसके दूर के रिश्ते का मामू भागलपुर स्टेशन पर पॉकेटमारी करता था . उसने पॉकेटमारी उसी मामू से सीखा था , पर वह इसे एक हुनर की तरह समझता था . एक बार मैंने भी जिद्द किया था की मुझे भी सिखाओ - तो उसने अपने मामू से मिलवाया था और तीन दिन तक उनका शागिर्द रहा था ( लेकिन अंतिम दिन एक लड़के को पीटते देखा तो सारा उत्साह काफूर हो गया और फिर  कभी मामू से नहीं मिला -- ये पूरा प्रकरण बड़ी मजेदार है , कभी इस पर भी सविस्तार लिखूंगा -). उन तीन दिनों में पॉकेटमारों के गतिविधियों के बारे में तो समझ बन ही गयी थी . खैर पूरी घटना पर एक बार फिर से जब गौर किया तो दो - तीन चेहरा नज़र आ रहा था जिसपर पॉकेटमारी का शक हो रहा था .

आज शाम फिर मेहन्दीपटनम बस स्टैंड पर रुका. मेरी नज़र एक चेहरे पर गई जिस पर मुझे शक था पॉकेटमारी का . उसे देखकर मैंने मुस्कुराया , उसने भी मुस्कराहट से जवाब दिया . मैं बस स्टैंड के बगल में खड़े स्वीट कॉर्न बेच रहे छोटे लड़के से दस रूपये का 'स्वीट कॉर्न ' बनाने को कहा . तब तक वो आदमी जिस पर मुझे शक था पॉकेटमारी का , उसने भी उस लड़के से दस रूपये का 'स्वीट कॉर्न ' बनाने को कहा. जब छोटू हमारे लिए 'स्वीट कॉर्न ' बना रहा था , तो उस आदमी ने पूछा -  'क्या काम करते हो ?' मैंने उसके प्रश्न को नज़रअंदाज़ कर दिया . उसने फिर पूछा - 'कहाँ तक पढ़े लिखे हो' - ये दोनो सवाल मुझे चुतियापा लगता है - मैंने हसते हुए कहा - 'स्वीट कॉर्न बन रहा है - खाते है'. खाने के बाद चेंज पैसे की समस्या आई. उसने बिना कहे ही मेरे पैसे चुका दिए . पता नहीं क्यों धन्यवाद देने की बजाय मेरे मुँह से निकल गया - अभी भी मेरे दस रूपये बांकी है . वह अजीब तरीके से हंसा , फिर बोला - ठीक है , लेकिन तुम करते क्या हो ?
मैंने कहा - कुछ करूँ ना करूँ लेकिन तुम्हारा वाला काम नहीं करता हूँ .
लेकिन मुझे तो बिरादर लगते हो , पहचान कैसे लिया -  - उसने फिर लगभग हसते हुए पूँछा. - बुरा आदमी   दीखता हूँ क्या ?

मैंने उसे गौर से देखा - मुझे वो कई सफेदपोश शरीफों से ज्यादा शरीफ लग रहा था . मैंने कहा - बुरा क्यों दिखोगे , बिरादर ही समझो - चलो एक फोटो खींचते हैं साथ -साथ . वो डर गया उसे लगा कहीं मैं उसे फंसा ना दूँ . मेरा उद्देश मात्र उसके साथ फोटो खिंचा इस घटना को फेसबुक या ब्लॉग पर डालने के लिए था . उसने थोड़ी सख्ती से कहा - नहीं फोटो - शोटो नहीं खिंचवाना . मेरी बिरादरी के नहीं हो लेकिन शरीफ हो - ये लो दस रूपये . यह कहकर उसने दस रुपया मेरी हथेली पर रख दिया और तेजी से गली की तरफ चला गया .

उस पॉकेटमार से अपने बारे में 'शरीफ ' सुनना सचमुच भला लगा .

~~~ रामानुज दुबे